धनबाद: कोयलांचल धनबाद और आसपास के ग्रामीण व शहरी इलाकों में प्रकृति पर्व करमा पूजा हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई गई। झारखंड की लोक संस्कृति में विशेष स्थान रखने वाला यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, सुख-समृद्धि और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान करम वृक्ष की डाली की विधि-विधान से पूजा की गई।
करमा पर्व को लेकर धनबाद के विभिन्न गांवों और मोहल्लों में सुबह से ही उत्सव का माहौल रहा। झरिया, गोविंदपुर, टुंडी, सिजुआ, बाघमारा समेत धनबाद शहर के कई क्षेत्रों में महिलाओं और युवतियों में खासा उत्साह देखने को मिला।
करमा पूजा की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। पर्व से करीब सात दिन पहले बहनें नदी या जलाशय से बालू लाकर डलिया में सात प्रकार के अनाज से जावा उगाती हैं। इसके बाद सात दिनों तक सुबह-शाम पारंपरिक करम गीतों के साथ जावा की पूजा और देखभाल की जाती है।
करमा पर्व के दिन उपवास रखने के बाद महिलाएं और युवतियां सामूहिक अखाड़ों में एकत्रित हुईं। करम डाली को स्थापित कर फूल-पत्तियों से सजाया गया। पूजा के दौरान करमा और धरमा से जुड़ी पारंपरिक कथा भी सुनी गई।
धनबाद के कई सामूहिक अखाड़ों में पारंपरिक वेशभूषा में महिलाओं और युवतियों ने ढोल-मांदर की थाप पर देर रात तक लोकनृत्य किया। बहनों ने पूजा-अर्चना कर अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना की।
अगले दिन सुबह विधि-विधान के साथ करम डाली और जावा का जलाशयों में विसर्जन किया गया। इसी के साथ करमा पर्व का पारंपरिक रूप से समापन हुआ।
















