धनबाद: महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर रविवार को झरिया स्थित अग्रवाल धर्मशाला सभागार में जनवादी लेखक संघ, धनबाद के तत्वावधान में साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षकों और साहित्य प्रेमियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य, सामाजिक सरोकारों और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता अनवर शमीम ने की, जबकि संचालन कुमार अशोक ने किया। आयोजन को दो सत्रों में विभाजित किया गया। पहले सत्र में “आज के विमर्श में प्रेमचंद” विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित हुई।
मुख्य वक्ता डॉ. मृणाल ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाएं आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के समक्ष मौजूद चुनौतियों के दौर में प्रेमचंद के साहित्य का पुनर्पाठ समय की आवश्यकता है। उनके अनुसार, प्रेमचंद की कहानियां सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करने का संदेश देती हैं।
संगोष्ठी में नारायण चक्रवर्ती, शिवकुमार पंडित, मधुसूदन पासवान, डॉ. हसन निजामी, प्रो. आलमगीर आलम, डॉ. लालदीप, डॉ. काशीनाथ चटर्जी, हेमंत मिश्रा, डॉ. शमीम अहमद, मनोज चौरसिया और इम्तियाज-बिन-अज़ीज़ सहित कई साहित्यकारों ने भी अपने विचार साझा किए।
दूसरे सत्र में हिंदी और उर्दू की कहानियों एवं लघुकथाओं का पाठ हुआ। कथाकार कमलेश ने ‘खिड़की’, रूपलाल बेदिया ने ‘धुरी’ तथा उर्दू कथाकार इम्तियाज गदर ने ‘दातून वाली बुढ़िया’ का पाठ किया। वहीं लघुकथाकार मार्टिन जॉन ने ‘राजनीति’ और ‘अघोषित शासक’, जबकि युवा लेखक चितरंजन गोप लुकाठी ने ‘एक ठेला स्वप्न’, ‘जय बांगला’ और ‘आदमी का डर’ शीर्षक लघुकथाओं का पाठ कर श्रोताओं की सराहना हासिल की।
कहानी पाठ के बाद शिशिर संतोष, डॉ. लालदीप, डॉ. हसन निजामी, एस. एम. आरफीन रिजवी, मनोज चौरसिया, डॉ. इकबाल हुसैन, डॉ. शमीम अहमद और डॉ. यूनुस फिरदौसी ने प्रस्तुत रचनाओं की समीक्षा करते हुए साहित्यिक विमर्श को आगे बढ़ाया।
कार्यक्रम के अंत में ज़ियाउर्रहमान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। वक्ताओं ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान समाज को दिशा देने वाली अमूल्य विरासत है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।
















