रांची: झारखंड के डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने नियुक्ति नियमावली में किए गए संशोधन को लेकर अपना पक्ष रखा। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सरकार की ओर से दलील पेश करते हुए कहा कि नियम-5 में संशोधन तदाशा मिश्रा को डीजीपी पद के लिए अवसर देने के उद्देश्य से किया गया था।
मामले में याचिकाकर्ता बाबूलाल मरांडी की ओर से दलील पूरी होने के बाद राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखा। सरकार का कहना है कि झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। हालांकि, एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में नियम-5 में किए गए संशोधन को लेकर आपत्ति जताई गई है।
तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर क्या है विवाद?
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि तदाशा मिश्रा डीजीपी रैंक में प्रोन्नत होने वाली राज्य की एकमात्र महिला अधिकारी थीं। सरकार की ओर से उनके नक्सलवाद और अपराध नियंत्रण के क्षेत्र में किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया गया और कहा गया कि उन्हें डीजीपी बनने का अवसर देने के लिए नियम में बदलाव किया गया।
तदाशा मिश्रा की नियुक्ति 30 दिसंबर 2025 को हुई थी, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति अगले दिन निर्धारित थी। इसी को लेकर एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के डीजीपी नियुक्ति संबंधी दिशा-निर्देशों के संदर्भ में सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में छह महीने की शेष सेवा से जुड़े प्रावधान को भी मुद्दा बनाया गया है।
24 सितंबर को भी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई 24 सितंबर को भी जारी रहने की जानकारी सामने आई है। राज्य सरकार की ओर से एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट पर अपना विस्तृत पक्ष रखने की बात कही गई है। मामले में अदालत की आगे की कार्यवाही और निर्देशों पर नजर बनी हुई है।
















