धनबाद: धनसार क्षेत्र के वार्ड संख्या-32 निवासी 61 वर्षीय दिव्यांग सरदार सविंद्र संघर्ष, आत्मसम्मान और हौसले की ऐसी मिसाल हैं, जिन्होंने दोनों पैर खो देने के बावजूद जीवन के सामने कभी हार नहीं मानी। वर्षों से वे अपने हाथों के सहारे मेहनत कर न केवल अपना बल्कि अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। आर्थिक कठिनाइयों और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया।
जीवनयापन के लिए सरदार सविंद्र ने समय-समय पर कई छोटे-मोटे कार्य किए। उन्होंने रद्दी अखबार खरीदने-बेचने का काम किया, सब्जियां बेचीं और अन्य छोटे व्यवसायों के माध्यम से परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं। संघर्षों से भरे इस सफर में अनेक कठिनाइयां आईं, लेकिन उन्होंने हर चुनौती का डटकर सामना किया और आत्मनिर्भर बनने का प्रयास जारी रखा। धनबाद की कई गलियों में लोग उनके संघर्ष और मेहनत की कहानी से परिचित हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने समय-समय पर उनकी मदद की, लेकिन वह सहायता स्थायी आजीविका का माध्यम नहीं बन सकी। वर्तमान में सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर और दिव्यांगजनों के लिए संचालित हैं, फिर भी सरदार सविंद्र का कहना है कि उन्हें अब तक किसी प्रभावी सरकारी सहायता का लाभ नहीं मिल पाया है।
इसी उम्मीद के साथ उन्होंने धनबाद के उपायुक्त से मदद की गुहार लगाई है, ताकि उन्हें कोई ऐसा साधन उपलब्ध कराया जा सके जिससे वे सम्मानपूर्वक अपना रोजगार जारी रख सकें और परिवार का बेहतर ढंग से पालन-पोषण कर सकें।
इस मामले में सामाजिक साहित्यिक जागरूकता मंच ने भी सरदार सविंद्र के समर्थन में पहल की है। मंच के संस्थापक आचार्य संजय सिंह ‘चंदन’ ने उपायुक्त से मांग की है कि सरदार सविंद्र को स्वरोजगार के लिए ई-रिक्शा (टोटो) उपलब्ध कराया जाए। उनका कहना है कि यदि उन्हें रोजगार का स्थायी साधन मिल जाए तो वे आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार का जीवन और बेहतर तरीके से चला सकेंगे।
स्थानीय लोगों का मानना है कि सरदार सविंद्र का संघर्ष समाज के लिए प्रेरणा है और ऐसे जरूरतमंद लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचना चाहिए, ताकि वे सम्मान के साथ आत्मनिर्भर जीवन जी सकें।
















