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SNMMCH में दो पुराने ऑक्सीजन प्लांट बंद, अब 20 करोड़ के नए प्लांट की तैयारी पर उठे सवाल

JP Bharat Shareधनबाद : धनबाद के शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (SNMMCH) में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। अस्पताल में ऑक्सीजन व्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर स्वास्थ्य विभाग ने करीब 20 करोड़ रुपये की लागत से दो नए लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट लगाने की…

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धनबाद : धनबाद के शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (SNMMCH) में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। अस्पताल में ऑक्सीजन व्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर स्वास्थ्य विभाग ने करीब 20 करोड़ रुपये की लागत से दो नए लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए टेंडर भी जारी कर दिया गया है। हालांकि, इस नई योजना के बीच अस्पताल के पुराने ऑक्सीजन प्लांटों की बदहाल स्थिति पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार, SNMMCH में पहले से तीन PSA ऑक्सीजन प्लांट मौजूद हैं, लेकिन इनमें से दो प्लांट तकनीकी खराबी के कारण लंबे समय से बंद पड़े हैं। वहीं एकमात्र 1000 LPM क्षमता वाला प्लांट ही किसी तरह चालू है, लेकिन उसमें भी लगातार ब्रेकडाउन और तकनीकी दिक्कतें सामने आती रही हैं।

अब स्वास्थ्य विभाग द्वारा 15-15 टन क्षमता वाले दो नए लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट लगाने की तैयारी की जा रही है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि भविष्य में मरीजों की बढ़ती संख्या और गंभीर परिस्थितियों से निपटने के लिए यह जरूरी कदम है। लेकिन लोगों के मन में सवाल यह उठ रहा है कि जब पहले से करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए गए प्लांटों का रखरखाव ठीक से नहीं हो पाया, तो नए प्लांटों की स्थिति भविष्य में क्या होगी।

स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य व्यवस्था पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या का समाधान केवल नए प्लांट लगाना नहीं, बल्कि पुराने सिस्टम को दुरुस्त कर जवाबदेही तय करना भी जरूरी है। यदि पुराने प्लांट समय पर मेंटेन किए जाते तो आज वे बंद हालत में नहीं रहते।

अस्पताल अधीक्षक का कहना है कि नए लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट शुरू होने के बाद पुराने PSA प्लांटों को बैकअप के तौर पर रखा जाएगा और मुख्य सप्लाई नई व्यवस्था से होगी। लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए लोगों में आशंका बनी हुई है कि कहीं यह नई परियोजना भी कुछ वर्षों बाद बंद पड़ी मशीनों की सूची में शामिल न हो जाए।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग के पास नए प्लांटों के रखरखाव, तकनीकी निगरानी और नियमित मरम्मत की कोई ठोस योजना है, या फिर हर बार खराबी आने पर नए टेंडर जारी करने की परंपरा जारी रहेगी।

प्रशासन के सामने अब चुनौती केवल नई मशीनें लगाने की नहीं, बल्कि मौजूदा बंद पड़े प्लांटों को दोबारा चालू कर स्वास्थ्य व्यवस्था में विश्वास बहाल करने की भी है।


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