आईआईटी धनबाद में डिजिटल रिपॉजिटरी कार्यशाला का शुभारंभ
धनबाद, 27 अप्रैल : आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में “डिजिटल रिपॉजिटरी यूजिंग ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर (DSpace)” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। यह कार्यक्रम संस्थान के गोल्डन जुबली लेक्चर थिएटर में आयोजित किया गया।
मुख्य अतिथि का संबोधन
कार्यक्रम में निदेशक प्रो. सुकुमार मिश्रा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि डिजिटल युग में ज्ञान के संरक्षण और प्रसार के लिए पुस्तकालयों को नई तकनीकों के साथ खुद को अपडेट करना बेहद जरूरी है।
पुस्तकालयों की बदलती भूमिका
- केंद्रीय पुस्तकालय के प्रभारी प्रो. अजय मंडल ने स्वागत भाषण में कहा कि:
- तकनीकी बदलाव के साथ लाइब्रेरियन की जिम्मेदारी बढ़ी है
- पुस्तकालय अब सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं
- डिजिटल प्लेटफॉर्म का महत्व तेजी से बढ़ रहा है
डिजिटल रिपॉजिटरी का महत्व
केंद्रीय पुस्तकालय के लाइब्रेरियन पार्थ डे ने बताया कि डिजिटल रिपॉजिटरी आज के सूचना युग में बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।
इससे:
- संस्थागत ज्ञान को सुरक्षित रखा जा सकता है
- शोध सामग्री को आसानी से साझा किया जा सकता है
डिजिटल एक्सेस बढ़ता है
NDLI की भूमिका
राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया (NDLI) के संयुक्त प्रधान अन्वेषक डॉ. बी. सुत्रधर ने कहा कि यह परियोजना देशभर में शैक्षणिक संसाधनों को सभी तक पहुंचाने का काम कर रही है।
उन्होंने बताया कि संस्थानों को डिजिटल रिपॉजिटरी बनाने के लिए तकनीकी सहायता और क्लाउड सुविधा भी दी जा रही है।
🛠️ क्या सिखाया जाएगा कार्यशाला में?
इस दो दिवसीय कार्यशाला में प्रतिभागियों को दिया जाएगा:
- डिजिटल रिपॉजिटरी का आर्किटेक्चर
- मेटाडाटा स्टैंडर्ड्स
- कंटेंट सबमिशन प्रोसेस
- डिजिटल प्रिजर्वेशन तकनीक
- DSpace सॉफ्टवेयर के जरिए रिपॉजिटरी बनाना
देशभर से आए प्रतिभागी
इस कार्यशाला में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं, जिससे यह एक राष्ट्रीय स्तर का ज्ञान साझा मंच बन गया है।
निष्कर्ष
आईआईटी धनबाद की यह पहल डिजिटल युग में पुस्तकालयों को सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न केवल लाइब्रेरियन बल्कि शोधार्थियों और छात्रों को भी फायदा मिलेगा।
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