धनबाद: देश की कोयला राजधानी के नाम से पहचान रखने वाला धनबाद आज अपनी खनन विरासत से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है। कभी जिस कोयले ने इस जिले को औद्योगिक पहचान दिलाई, वही अब कई स्थानों पर लोगों के लिए खतरे का कारण बन गया है। उत्पादन बंद होने के बाद छोड़ी गई कई ओपनकास्ट कोयला खदानें बारिश और भू-जल के कारण विशाल जलकुंडों में बदल चुकी हैं, जो आए दिन हादसों का कारण बन रही हैं।
इन जलभराव वाली खदानों में डूबने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। कई मामलों में छात्र, मजदूर और स्थानीय लोगों की जान जा चुकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन खदानों के आसपास पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, घेराबंदी और चेतावनी बोर्ड नहीं होने के कारण लोग अनजाने में इनकी चपेट में आ जाते हैं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि धनबाद जैसे संवेदनशील जिले में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की कोई स्थायी टीम मौजूद नहीं है। किसी भी बड़ी दुर्घटना के बाद रांची से NDRF की टीम को बुलाना पड़ता है, जिसे मौके पर पहुंचने में कई घंटे लग जाते हैं। ऐसे में शुरुआती बचाव कार्य स्थानीय गोताखोरों, मछुआरों और स्वयंसेवकों के भरोसे होता है, जिनके पास आधुनिक उपकरण और विशेष प्रशिक्षण का अभाव रहता है।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि धनबाद में 24 घंटे सक्रिय रहने वाली स्थायी NDRF इकाई स्थापित की जाए। उनका मानना है कि इससे डूबने, गैस रिसाव और खनन से जुड़ी अन्य आपदाओं में त्वरित राहत और बचाव कार्य संभव होगा तथा कई लोगों की जान बचाई जा सकेगी।
लोगों का यह भी कहना है कि जिन खदानों से वर्षों तक देश को ऊर्जा और सरकार को राजस्व मिला, उनके बंद होने के बाद सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। प्रशासन से मांग की जा रही है कि सभी परित्यक्त खदानों की पहचान कर उनकी घेराबंदी कराई जाए, चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं और संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए।
धनबाद की जनता अब सवाल उठा रही है कि यदि यह जिला देश की अर्थव्यवस्था में इतना बड़ा योगदान देता है, तो यहां लोगों की सुरक्षा के लिए स्थायी आपदा राहत व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही। लोगों का मानना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार और संबंधित एजेंसियों को ठोस और समयबद्ध कदम उठाने होंगे।
















