मखाना की खेती में नई क्रांति: BAU के प्रयास से भागलपुर बना उभरता हब

JP Bharat Shareभागलपुर : बिहार का पारंपरिक उत्पाद मखाना अब राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुका है। राज्य और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों के साथ-साथ बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर की पहल ने इस क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। अब सिल्क सिटी भागलपुर में…

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भागलपुर : बिहार का पारंपरिक उत्पाद मखाना अब राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुका है। राज्य और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों के साथ-साथ बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर की पहल ने इस क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। अब सिल्क सिटी भागलपुर में भी मखाना की खेती तेजी से फैल रही है।

सीमांचल से निकलकर भागलपुर तक पहुंचा मखाना

अब तक मखाना की खेती मुख्य रूप से सीमांचल इलाकों तक सीमित थी, लेकिन BAU के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह की पहल से भागलपुर के किसान भी इस खेती से जुड़ने लगे हैं।

सबसे खास बात यह है कि अब मखाना की खेती के लिए बड़े तालाब की जरूरत नहीं—3 से 4 फीट पानी वाली खेतिहर जमीन में भी इसकी सफल खेती संभव हो गई है।

नई तकनीक और बीज से बढ़ेगा मुनाफा

किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए BAU के वैज्ञानिकों ने नई तकनीक और उन्नत बीज विकसित किए हैं। इस शोध को भारत सरकार से पेटेंट भी मिल चुका है।

वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि मखाना के बेहतर उत्पादन के लिए किन जीन वाले बीज सबसे उपयुक्त हैं।

फिलहाल BAU परिसर के तालाबों में मखाना पर विभिन्न प्रयोग किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय का लक्ष्य है कि भागलपुर और आसपास के जिलों के ज्यादा से ज्यादा किसान इस लाभदायक खेती से जुड़ें।

वैज्ञानिक लगातार किसानों को तकनीकी सहयोग और प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।

निष्कर्ष

मखाना अब सिर्फ पारंपरिक फसल नहीं रहा, बल्कि किसानों के लिए “व्हाइट गोल्ड” बनता जा रहा है। BAU की पहल और वैज्ञानिक तकनीक के दम पर भागलपुर भी मखाना उत्पादन का नया केंद्र बनकर उभर रहा है।

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