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तमिलनाडु में धनबाद की बेटी की मौत, गांव पहुंचा शव तो मचा कोहराम

JP Bharat Shareतमिलनाडु के तिरुवल्लूर में अमोनिया गैस रिसाव की घटना में जान गंवाने वाली धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड अंतर्गत जीतपुर पंचायत के बंगारो गांव की प्रीति राणा का पार्थिव शरीर बुधवार को उनके पैतृक गांव पहुंचा। शव के गांव पहुंचते ही पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई और परिजनों का रो-रोकर…

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तमिलनाडु के तिरुवल्लूर में अमोनिया गैस रिसाव की घटना में जान गंवाने वाली धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड अंतर्गत जीतपुर पंचायत के बंगारो गांव की प्रीति राणा का पार्थिव शरीर बुधवार को उनके पैतृक गांव पहुंचा। शव के गांव पहुंचते ही पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।

गौरतलब है कि 21 जून को तमिलनाडु के एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में अमोनिया गैस रिसाव की घटना हुई थी, जिसमें प्रीति गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज के दौरान 26 जून को उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनका पार्थिव शरीर चेन्नई से हवाई मार्ग के जरिए रांची लाया गया और फिर विशेष एंबुलेंस से टुंडी के बंगारो गांव पहुंचाया गया।

शव पहुंचने के बाद मृतका के मायके और ससुराल पक्ष के बीच विवाद की स्थिति भी उत्पन्न हो गई। हालांकि प्रशासन की मौजूदगी और सूझबूझ से मामला शांत कराया गया, जिसके बाद अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।

लेकिन प्रीति की मौत ने एक बार फिर झारखंड से होने वाले पलायन और स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी जैसे गंभीर मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि देश के कुल खनिज उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला झारखंड आज भी रोजगार के अभाव में क्यों जूझ रहा है? आखिर क्यों यहां के हजारों युवा और मजदूर रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों का रुख करने को मजबूर हैं?

पिछले कुछ वर्षों में तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से झारखंड के प्रवासी मजदूरों की मौत की कई घटनाएं सामने आई हैं। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और पलायन रोकने के लिए ठोस समाधान अभी भी बड़ा सवाल बना हुआ है।

मृतका के परिजनों का आरोप है कि उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिली। वहीं प्रशासन की ओर से आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया की जानकारी दी गई है।

फिलहाल प्रीति राणा की मौत ने एक बार फिर सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर झारखंड के लोगों को सम्मानजनक रोजगार अपने ही राज्य में कब मिलेगा, ताकि उन्हें रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों का रुख न करना पड़े।


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