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Odisha 65 साल बाद भगवान जगन्नाथ मंदिर को वापस मिलेगी 57 एकड़ जमीन, राजस्व बोर्ड ने 300 करोड़ की लीज घोषित की अवैध

JP Bharat Shareभुवनेश्वर: ओडिशा में भगवान जगन्नाथ मंदिर की संपत्तियों के संरक्षण को लेकर एक बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। ओडिशा राजस्व बोर्ड ने पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर की करीब 57 एकड़ मूल्यवान भूमि को दोबारा मंदिर के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है। इस भूमि की अनुमानित बाजार कीमत करीब 300 करोड़…

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भुवनेश्वर: ओडिशा में भगवान जगन्नाथ मंदिर की संपत्तियों के संरक्षण को लेकर एक बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। ओडिशा राजस्व बोर्ड ने पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर की करीब 57 एकड़ मूल्यवान भूमि को दोबारा मंदिर के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है। इस भूमि की अनुमानित बाजार कीमत करीब 300 करोड़ रुपये आंकी गई है। यह जमीन खुर्दा जिले के जटनी तहसील के कुड़ियारी मौजा में स्थित है, जिसे वर्ष 1961 में औद्योगिक विकास के उद्देश्य से एक निजी कंपनी को लीज पर दिया गया था।

राजस्व बोर्ड के सदस्य सत्यव्रत साहू की अध्यक्षता वाली अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए दो पुनरीक्षण याचिकाओं को स्वीकार किया और वर्ष 1961 की लीज को अवैध घोषित कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह लीज ओडिशा हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1951 की धारा-19 का उल्लंघन करते हुए दी गई थी, क्योंकि इसके लिए एंडोमेंट कमिश्नर की पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी।

अदालत ने जटनी तहसीलदार को निर्देश दिया है कि रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (RoR) में आवश्यक संशोधन कर उक्त भूमि को दोबारा भगवान जगन्नाथ, पुरी के नाम दर्ज किया जाए। साथ ही भूमि को राजस्व अभिलेखों में ‘अनाबादी-पुरातन पतित’ श्रेणी में दर्ज करने का भी निर्देश दिया गया है।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि जिस निजी कंपनी को उद्योग स्थापित करने के उद्देश्य से यह भूमि लीज पर दी गई थी, उसने वर्षों बीत जाने के बावजूद वहां कोई उद्योग स्थापित नहीं किया। इतना ही नहीं, मंदिर प्रशासन को भी इस जमीन से किसी प्रकार का आर्थिक लाभ नहीं मिला और भूमि लंबे समय तक खाली पड़ी रही।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी अवैध लेन-देन के आधार पर रिकॉर्ड ऑफ राइट्स तैयार किया गया है, तो उसे कानून के अनुसार संशोधित किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय श्री जगन्नाथ मंदिर की ऐतिहासिक और धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस फैसले से न केवल मंदिर की बहुमूल्य भूमि दोबारा उसके अधिकार में आएगी, बल्कि भविष्य में धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों के संरक्षण और अवैध हस्तांतरण पर रोक लगाने के लिए भी यह निर्णय एक अहम मिसाल माना जा रहा है।


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